उत्तराखंड

काफल के बढ़ते दाम: क्या बचपन की यादें भी महंगी हो गईं?

पहाड़ का रसीला फल काफल जंगलों से बाजार तक तो पहुंचा, लेकिन इसकी कीमत अब आम लोगों की पहुंच से बाहर हो गई है। चैत में पकने वाला काफल बाजार में 400 रुपये किलो बिक रहा है, जिससे लोग चाहकर भी अपना पसंदीदा फल नहीं चख पा रहे हैं।

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औषधीय गुणों से भरपूर काफल उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के जंगलों में भरपूर मात्रा में पाया जाता है। यह फल कभी यहां के लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा था, आज यह कई परिवारों की आजीविका का जरिया भी है। उत्तराखंड के अलग-अलग जिलों में ग्रामीण इसको जंगल से तोड़कर बाजारों में बेचते हैं लेकिन अभी अधिकतर क्षेत्रों में काफल पूरी तरह पका नहीं है इसी वजह से भी इसके दामों में बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में जैसे-जैसे दूसरे क्षेत्रों से काफल बाजार पहुंचेगा, दाम में गिरावट की उम्मीद है।

एक ज़माना था… जब मन किया, जंगल गए, पेड़ों से ताज़ा काफल तोड़ा, मुट्ठी भरकर खाया, और बचपन की वो खट्टी-मीठी यादें समेट लीं। अब हाल ये है कि वही काफल, जो कभी हमारी झोली में मुफ्त में गिरता था, आज 400 रुपये किलो खरीदना पड़ रहा है।

पहाड़ खाली हो रहे हैं, गांव सूने हो रहे हैं, जंगल सिमट रहे हैं… और बचपन की वो निशान भी महंगे होते जा रहे हैं। पलायन की मार ने वो दिन छीन लिए जब काफल तोड़ने के लिए किसी दाम की जरूरत नहीं होती थी, बस एक हंसी-खुशी भरी दोपहर चाहिए होती थी।

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Deepak Panwar

Deepak Panwar is a journalist, author, and founder based in Dehradun Uttarakhand, India. He is recognized for his impactful work in journalism and for founding multiple news and media platforms, including HinduLIVE Media.

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